भारत को दुनिया में असली सम्मान हासिल करना है, तो उसे अपनी तकनीक, कारोबार और प्रतिभा के दम पर मजबूत बनना होगा। ज़ोहो के संस्थापकश्रीधर वेम्बू ने इसी विचार के साथ देश को ‘बिल्ड, बिल्ड और बिल्ड’ का मंत्र दिया है। उनका मानना है कि भारत की तरक्की का रास्ता दूसरों से मान्यतामांगने में नहीं, बल्कि ऐसी कंपनियां, संस्थान और तकनीक विकसित करने में है, जो दुनिया में अपनी अलग पहचान बना सकें। वेम्बू के मुताबिक, देशकी प्रगति किसी एक राजनीतिक दल पर निर्भर नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह राष्ट्रीय प्राथमिकता बननी चाहिए।
श्रीधर वेम्बू की यह टिप्पणी अमेरिकी निवेशक और गणितज्ञ एरिक वाइनस्टीन की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद सामने आई। वाइनस्टीन नेभारत, भारतीयों, हिंदुओं और भारतीय-अमेरिकियों के प्रति ऑनलाइन बढ़ती नफरत और शत्रुतापूर्ण टिप्पणियों पर चिंता जताई थी। इस चर्चा केजवाब में वेम्बू ने उस सोच की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें कुछ लोग भारत की क्षमताओं पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं कि अगर देश इतना सक्षमहै, तो भारतीय बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश क्यों जाते हैं। यह सवाल भारतीय प्रतिभा, घरेलू अवसरों और देश में मजबूत संस्थान बनाने कीजरूरत पर एक बड़ी बहस को सामने लाता है।
वेम्बू का मानना है कि नस्लवादी टिप्पणियों और नफरत का जवाब उसी भाषा में देने के बजाय भारत को अपनी उपलब्धियों से देना चाहिए। जबदेश के भीतर ऐसे कारोबार, तकनीकी समाधान और संस्थान विकसित होंगे, जो भारतीय प्रतिभा को आगे बढ़ने के अवसर देंगे, तो भारत कीवैश्विक स्थिति भी मजबूत होगी। उनके विचार में केवल आलोचनाओं का जवाब देने में ऊर्जा खर्च करने के बजाय उस ऊर्जा को कुछ नया बनाने, रोजगार पैदा करने और देश की क्षमताओं को बढ़ाने में लगाया जाना चाहिए।
उन्होंने उन लोगों की सोच से भी असहमति जताई, जो मानते हैं कि भारत कभी विकसित नहीं हो सकता। वेम्बू के मुताबिक, बड़ी कंपनियां औरमजबूत राष्ट्र बनाने के लिए भविष्य की संभावनाओं पर भरोसा करना जरूरी है। किसी देश की प्रगति रातोंरात नहीं होती; इसके लिए लगातारमेहनत, नवाचार, उद्यमिता और मजबूत संस्थागत ढांचे की जरूरत होती है। भारत के सामने चुनौती सिर्फ आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि ऐसामाहौल तैयार करने की भी है, जहां प्रतिभाशाली लोगों को अपने विचारों को कारोबार और उपयोगी तकनीक में बदलने का अवसर मिल सके।
श्रीधर वेम्बू का ‘बिल्ड, बिल्ड और बिल्ड’ संदेश इसी सोच को रेखांकित करता है कि भारत को अपनी ताकत खुद तैयार करनी होगी। वैश्विकसम्मान केवल दावों से नहीं, बल्कि उन उत्पादों, कंपनियों, शोध और संस्थानों से मिलता है, जो वास्तविक बदलाव लाते हैं। उनकी बात का सारसाफ है—दुनिया क्या कहती है, इस पर उलझने के बजाय भारत को अपने निर्माण और विकास पर ध्यान देना चाहिए। आखिरकार, देश कीअसली पहचान उसकी क्षमता, उपलब्धियों और अपने लोगों के लिए बनाए गए अवसरों से ही मजबूत होती है।