‘मिर्जापुर’ में दिखने वाली खूनी जंग और सत्ता की लड़ाई दर्शकों को खूब रोमांचित करती है। लेकिन क्या इस तरह की हिंसा पसंद करने वाले लोग असल जिंदगी में भी वैसे ही होते हैं? सीरीज के क्रिएटर और लेखक पुनीत कृष्णा का जवाब है- बिल्कुल नहीं! हाल ही में एक बातचीत के दौरान पुनीत ने बताया कि उन्हें पर्दे पर हिंसा देखना पसंद है, बशर्ते उसे रचनात्मक तरीके से पेश किया जाए। उन्होंने क्वेंटिन टारनटिनो की फिल्मों से लेकर कोरियाई सिनेमा तक, उन फिल्मकारों की तारीफ की जो एक्शन को सिर्फ मारधाड़ तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे कहानी का प्रभावशाली हिस्सा बनाते हैं। इसी बातचीत में उन्होंने दिग्गज निर्देशक राजकुमार हिरानी के साथ काम करने के अपने शुरुआती अनुभव भी साझा किए।
ऑन-स्क्रीन हिंसा को लेकर अपनी पसंद के बारे में बात करते हुए पुनीत ने कहा, "नहीं, मुझे हिंसा बिल्कुल पसंद नहीं है। अपनी निजी जिंदगी में मैं बिल्कुल भी हिंसक इंसान नहीं हूं। लेकिन, जब बात स्क्रीन की आती है, तो अगर हिंसा को रचनात्मक तरीके से दिखाया जाए, तो मुझे यह बहुत मनोरंजक लगती है।" उनका मानना है कि किसी एक्शन सीन का असर इस बात पर निर्भर करता है कि निर्देशक उसे किस अंदाज में पर्दे पर उतारता है। यही वजह है कि उन्हें क्वेंटिन टारनटिनो की फिल्में पसंद हैं। भारतीय सिनेमा का जिक्र करते हुए उन्होंने यश चोपड़ा की एक्शन फिल्मों की भी तारीफ की और ‘धुरंधर’ के विजुअल ट्रीटमेंट को सराहा। पुनीत के लिए हिंसा की अपील उसके चित्रण में है, न कि हिंसा में ही।
पुनीत ने कोरियाई सिनेमा को भी इस मामले में खास बताया। उनके मुताबिक, वहां हिंसा को जिस तरह फिल्माया जाता है, वह दर्शकों पर अलग तरह का प्रभाव छोड़ता है। उन्होंने विशाल भारद्वाज की फिल्मों और विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ का भी जिक्र किया। इन उदाहरणों के जरिए पुनीत ने अपनी पसंद का एक अहम पहलू सामने रखा- उन्हें ऐसा सिनेमा आकर्षित करता है, जिसमें एक्शन कहानी और किरदारों के साथ जुड़कर सामने आए। ‘मिर्जापुर’ जैसी सीरीज में भी हिंसा केवल चौंकाने का जरिया नहीं, बल्कि किरदारों की महत्वाकांक्षा, सत्ता की भूख और उनके बीच के संघर्ष को दिखाने का माध्यम बनती है। यही अंतर किसी सामान्य एक्शन सीन को कहानी का यादगार हिस्सा बना सकता है।
बातचीत का एक दिलचस्प हिस्सा राजकुमार हिरानी के साथ पुनीत के शुरुआती दिनों से जुड़ा रहा। आज भले ही पुनीत ‘मिर्जापुर’ जैसी लोकप्रिय सीरीज के पीछे की रचनात्मक ताकत के रूप में पहचाने जाते हैं, लेकिन उनके करियर की शुरुआत असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर हुई थी। हिरानी से अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए उन्होंने कहा, "वह बहुत शानदार अनुभव था। वे सच में एक कमाल के इंसान हैं। जब मैं उनसे मिलने गया, तब तक वे ‘मुन्ना भाई’ सीरीज की दो फिल्में बना चुके थे। उस समय भी वे एक बड़े निर्देशक थे—और आज भी हैं—फिर भी उन्होंने मेरे लिए समय निकाला।" पुनीत ने बताया कि उन्होंने बिना किसी जान-पहचान के हिरानी से संपर्क किया था। उन्होंने कहा, "मैंने एक ‘कोल्ड कॉल’ के जरिए उनसे संपर्क किया—हमारी पहले से कोई जान-पहचान नहीं थी—फिर भी उन्होंने मुझे समय दिया, मेरे साथ बैठे और मुझे अपने प्रोजेक्ट्स पर काम करने का मौका दिया।"
हिरानी के साथ काम करते हुए पुनीत को फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने का अवसर मिला। उन्होंने फीचर फिल्मों के साथ-साथ विज्ञापन परियोजनाओं में भी असिस्टेंट के रूप में काम किया। ‘मुन्ना भाई’ सीरीज की अमेरिका की पृष्ठभूमि वाली फिल्म के प्री-प्रोडक्शन के दौरान ट्रेलर शूट पर काम करना उनके लिए खास अनुभव था, क्योंकि यह पहली बार था जब वह किसी फिल्म सेट पर पहुंचे थे। पुनीत ने इस अनुभव को शानदार बताते हुए हिरानी की दरियादिली की तारीफ की। उनके अनुभवों से साफ है कि एक तरफ वह पर्दे पर हिंसा को नए और प्रभावशाली अंदाज में पेश करने के कायल हैं, तो दूसरी तरफ फिल्म निर्माण की दुनिया में मिले मार्गदर्शन को भी उतनी ही अहमियत देते हैं। आखिरकार, चाहे ‘मिर्जापुर’ की अंधेरी दुनिया हो या किसी फिल्म का यादगार एक्शन सीन, पुनीत के लिए कहानी कहने का अंदाज ही सबसे ज्यादा मायने रखता है!