अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत और चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए, दोनों देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। एक ओर जहां वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना “मित्र” बताते हैं, वहीं दूसरी ओर वे G-7 देशों से अपील कर रहे हैं कि भारत और चीन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाएं। ट्रंप का यह कदम रूस पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है, ताकि रूस-यूक्रेन युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त किया जा सके।
रूस पर दबाव बनाने की रणनीति
राष्ट्रपति ट्रंप की यह रणनीति सीधे तौर पर रूस से जुड़ी है। अमेरिका चाहता है कि रूस की युद्ध क्षमता को कमजोर किया जाए, ताकि वह यूक्रेन पर जारी आक्रमण से पीछे हटे। इसके लिए ट्रंप सरकार उन देशों पर दबाव बना रही है जो रूस से कच्चा तेल या अन्य संसाधन खरीद रहे हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख देश हैं, जिन्होंने रूस से व्यापार को पूरी तरह बंद नहीं किया है। इसी कारण ट्रंप प्रशासन अब इन देशों पर टैरिफ लगाकर उन्हें रूस से व्यापार खत्म करने के लिए मजबूर करना चाहता है।
G-7 देशों से समर्थन की अपील
इस योजना को और प्रभावी बनाने के लिए ट्रंप ने G-7 देशों के वित्त मंत्रियों के साथ एक अहम बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। इस बैठक के जरिए वे यह प्रयास करेंगे कि बाकी G-7 देश भी भारत और चीन पर 50 से 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाएं। कनाडा, जो फिलहाल G-7 की अध्यक्षता कर रहा है, ने ट्रंप की अपील और प्रस्तावित बैठक की पुष्टि की है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि बाकी देश ट्रंप के इस प्रस्ताव को कितना समर्थन देंगे।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर असर
भारत पहले से ही अमेरिका द्वारा लगाए गए 25 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ से परेशान है। इससे दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में तनाव देखा जा रहा है। अब अगर अन्य देश भी ट्रंप की बात मानकर भारत पर टैरिफ लगाते हैं, तो इससे भारत की वैश्विक बाजार में स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। यह स्थिति ऐसे समय में पैदा हो रही है जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बनाने की दिशा में प्रयासरत है।
यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया
अमेरिका के इस कदम के जवाब में यूरोपीय संघ ने फिलहाल ट्रंप के प्रस्ताव से दूरी बना ली है। यूरोपीय नेताओं का मानना है कि भारत और चीन जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों पर भारी टैरिफ लगाने से आर्थिक नुकसान हो सकता है और यह प्रतिशोध की कार्रवाई को भी जन्म दे सकता है। इसलिए यूरोपीय संघ ने भारत और चीन पर सीधे प्रतिबंध लगाने की बजाय रूस पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की नीति अपनाने का सुझाव दिया है।
निष्कर्ष
राष्ट्रपति ट्रंप की यह रणनीति एक बार फिर यह साबित करती है कि उनकी विदेश नीति में दोस्ती और व्यापार दो अलग-अलग ट्रैक पर चलते हैं। भारत को अब इस चुनौतीपूर्ण स्थिति का कूटनीतिक और आर्थिक रूप से संतुलित जवाब देना होगा। जहां एक ओर उसे रूस के साथ अपने संबंधों को संभालना है, वहीं अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने व्यापारिक हितों को भी बचाए रखना है।
इस प्रकार, आने वाले हफ्तों में ट्रंप की इस पहल पर G-7 और भारत की प्रतिक्रिया वैश्विक व्यापार और कूटनीति की दिशा तय कर सकती है।