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पूजा मेरी जान रिव्यू: जब ‘नहीं’ को समझना भी एक बड़ी सामाजिक परीक्षा बन जाए



जिस मुद्दे को यह उठाती है, वह इसे एक बार देखने लायक जरूर बनाता है।


Posted On:Friday, October 2, 2026


निर्देशक - नवजोत गुलाटी और विपाशा अरविंद
कलाकार - मृणाल ठाकुर , हुमा कुरैशी , विजय राज और विक्रम सिंह चौहान
अवधि - 170 मिनट
प्लेटफार्म - ज़ी5

किसी रिश्ते को खत्म करने के लिए क्या किसी वजह की जरूरत होती है? और क्या किसी को पसंद न करना अपने आप में पर्याप्त जवाब नहीं है? 'पूजा मेरी जान' इन सवालों को एक ऐसे मामले के जरिए सामने रखती है, जहां एक लड़की का किसी लड़के के प्यार को स्वीकार न करना धीरे-धीरे उसके खिलाफ आरोप में बदल जाता है। फिल्म की शुरुआत एक अहम सवाल से होती है और आगे बढ़ते हुए यह सवाल सिर्फ पूजा और अनिकेत के रिश्ते तक सीमित नहीं रहता। कहानी रिजेक्शन, एकतरफा प्यार, सोशल मीडिया की भीड़ और उस मानसिकता पर बात करती है, जिसमें लड़की के 'न' को कई बार जवाब के बजाय चुनौती समझ लिया जाता है।

पूजा और अनिकेत दोस्त हैं, लेकिन अनिकेत के लिए यह रिश्ता दोस्ती से आगे निकल चुका है। वह पूजा से अपने प्यार का इजहार करता है और पूजा साफ तौर पर उसे मना कर देती है। इसके बाद घटनाएं अचानक ऐसा मोड़ लेती हैं, जिसकी शायद पूजा ने कल्पना भी नहीं की होगी। अनिकेत की मौत हो जाती है और उसके पीछे छोड़ा गया ईमेल पूजा की जिंदगी को पूरी तरह बदल देता है। देखते ही देखते सवाल यह नहीं रह जाता कि अनिकेत ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया, बल्कि चर्चा इस बात पर होने लगती है कि क्या पूजा उसकी मौत के लिए जिम्मेदार है। सोशल मीडिया इस कहानी में आग में घी का काम करता है और निजी मामला सार्वजनिक बहस बन जाता है।

यहीं से फिल्म अपनी असली कहानी शुरू करती है। पूजा की दोस्त सना एक वकील है और शुरुआत में वह भी इस मामले को पूजा के नजरिए से नहीं देखती। उसके लिए भी अनिकेत की मौत के पीछे पूजा की भूमिका पर सवाल हैं। लेकिन जैसे-जैसे वह मामले की तह में जाती है, उसका नजरिया बदलने लगता है। हुमा कुरैशी ने सना के किरदार में इस बदलाव को सहजता से निभाया है। वह सिर्फ दोस्त बनकर पूजा का साथ नहीं देतीं, बल्कि एक वकील के तौर पर मामले को समझने की कोशिश भी करती हैं। उनके सामने सरकारी वकील जतिन त्रिवेदी हैं, जिन्हें विजय राज ने निभाया है। दोनों के बीच होने वाली कानूनी बहस फिल्म को अपने सबसे जरूरी हिस्से तक पहुंचाती है।

मृणाल ठाकुर ने पूजा को बहुत संयमित अंदाज में निभाया है। किरदार के सामने अचानक ऐसी स्थिति आ जाती है, जिसमें उसका निजी जीवन, दोस्ती और फैसले सब सार्वजनिक सवाल बन जाते हैं। मृणाल इस बेचैनी को बड़े हावभाव के बजाय अपनी बॉडी लैंग्वेज और शांत अभिनय से दिखाती हैं। पूजा के किरदार में कुछ फैसले ऐसे हैं, जिन पर दर्शक सवाल उठा सकते हैं, लेकिन यह उसकी परफॉर्मेंस की कमी नहीं बल्कि स्क्रीनप्ले से जुड़ा पहलू है। फिल्म पूजा को एकदम निर्दोष या एकदम गलत साबित करने के बजाय उसके व्यवहार की कुछ जटिलताओं को सामने रखती है, हालांकि इन जटिलताओं को और विस्तार मिलने की जरूरत महसूस होती है।

विक्रम सिंह चौहान भी अनिकेत के किरदार में असर छोड़ते हैं। वह अपने किरदार की बेचैनी और भावनात्मक टूटन को पर्दे पर अच्छी तरह लेकर आते हैं। अनिकेत सिर्फ एकतरफा प्यार करने वाला शख्स नहीं है; उसके व्यवहार में असुरक्षा और भावनात्मक निर्भरता भी दिखाई देती है। फिल्म के लिए यही हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण हो सकता था, क्योंकि किसी व्यक्ति का रिजेक्शन के बाद भावनात्मक रूप से टूटना और उस टूटन की जिम्मेदारी दूसरे व्यक्ति पर डाल देना दो अलग बातें हैं। कहानी इस फर्क को छूती जरूर है, लेकिन इसे और मजबूती से विकसित किया जा सकता था।

फिल्म की सबसे दिलचस्प परत सोशल मीडिया वाली है। जैसे ही अनिकेत की मौत की खबर सामने आती है, लोगों को पूरी कहानी जाने बिना अपनी राय बनाने में देर नहीं लगती। पूजा के खिलाफ माहौल बनने लगता है और उसके निजी फैसलों की सार्वजनिक जांच शुरू हो जाती है। यहां फिल्म आज के डिजिटल दौर की उस आदत पर सवाल उठाती है, जिसमें कुछ पोस्ट, एक ईमेल या किसी एक पक्ष की कहानी के आधार पर लोग तुरंत फैसला सुना देते हैं। किसी घटना के पीछे की पूरी सच्चाई जानने से पहले राय बना लेना कहानी में एक महत्वपूर्ण मुद्दे के तौर पर सामने आता है।

हालांकि फिल्म का कोर्टरूम हिस्सा उतना प्रभावशाली नहीं बन पाता, जितना इस कहानी से उम्मीद की जा सकती थी। विजय राज अपने किरदार में अच्छे हैं, लेकिन उनके पक्ष को कुछ और मजबूत तर्क दिए जाते तो बहस ज्यादा धारदार बन सकती थी। अदालत में दोनों पक्षों के नजरिए सामने आते हैं, लेकिन कई जगह टकराव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचता। कुछ घटनाएं भी तेजी से आगे बढ़ती हैं, जिससे कुछ भावनात्मक क्षणों को पूरी तरह विकसित होने का मौका नहीं मिलता। सना का शुरुआती नजरिया बदलकर पूजा के पक्ष में आ जाना भी थोड़ा जल्दी होता है। अगर इस बदलाव को ज्यादा समय मिलता, तो उसका किरदार और विश्वसनीय बन सकता था।

स्क्रीनप्ले की एक बड़ी कमजोरी पूजा और अनिकेत के रिश्ते की अधूरी पड़ताल है। पूजा को पता है कि अनिकेत उससे प्यार करता है, फिर भी दोनों की दोस्ती जारी रहती है। इतना ही नहीं, वह अपने स्टार्टअप के लिए उससे दस लाख रुपये भी लेती है। यह स्थिति कहानी में एक महत्वपूर्ण नैतिक और भावनात्मक सवाल खड़ा करती है, लेकिन फिल्म इसे उतनी गहराई से नहीं खोलती, जितनी जरूरत थी। पूजा के दूसरे रिश्तों और सना के नजरिए में आने वाले बदलाव को भी थोड़ा और विस्तार मिलता तो कहानी ज्यादा संतुलित महसूस होती।

फिर भी 'पूजा मेरी जान' का सबसे मजबूत पक्ष उसका विषय है। फिल्म किसी लड़की के 'न' कहने के अधिकार और उसके बाद उस पर डाली जाने वाली सामाजिक जिम्मेदारी पर जरूरी सवाल उठाती है। क्या किसी के प्यार को स्वीकार न करना किसी अपराध के बराबर हो सकता है? क्या किसी व्यक्ति के फैसले और दूसरे व्यक्ति की प्रतिक्रिया के बीच फर्क नहीं किया जाना चाहिए? फिल्म इन सवालों के आसान जवाब देने के बजाय बहस की गुंजाइश छोड़ती है। करीब दो घंटे की यह फिल्म हर स्तर पर परफेक्ट नहीं है और इसकी पटकथा में कुछ जगह और कसावट की जरूरत महसूस होती है, लेकिन जिस मुद्दे को यह उठाती है, वह इसे एक बार देखने लायक जरूर बनाता है। खासकर उन दर्शकों के लिए, जिन्हें रिश्तों, रिजेक्शन और समाज में जेंडर को लेकर बनी धारणाओं पर आधारित कहानियां पसंद हैं।


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